Bhagvad Gita : 38 Videos posted

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Introduction in English

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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The enemies of the Pandavas are the Kauravas who are the sons of Pandu's brother, Dhritarashtra. Dhritarashtra cannot manage to restrain his son Duryodhana who bitterly resents the achievements of his cousins (the Pandavas). Duryodhana arranges for his maternal uncle to challenge Yudhishthira to a game of dice. Yudhishthira gambles everything away, even himself in the game. The Pandavas have to go into exile but when they return, they engage the Kauravas in battle. Krishna fights on the side of the Pandavas and serves as Arjuna's charioteer. The famous "Song of the Lord" or Bhagavad - Gita is actually a book within the Mahabharata. On the battlefield of Krukshetra, Arjuna is so depressed seeing his own relatives standing against him for fight. At that time, God (Lord Krishna) himself explained Arjun the secret of life and inspire him to fight against the evil. Sanjaya, son of charioteer Gavalgana, is Dhritarashtra's adviser and also his charioteer. Sanjaya was given divine vision by Veda Vyasa and that is how he knew what was going on in the war , even though he was always at Hastinapur with Dhritarashtra.

Gita is a practical philosophy of living an ideal social life. No one in this world can fully describe the glory of Gita. However by reading this book, you will understand that God was never far away from you, he is just waiting for you to get to know about the truth of life. In this book , a brief description of Lord Krishna’s golden words or Bhagavad - Gita is given, divided into eighteen chapters. The golden words of Lord Krishna are explained in very simple language, though their meaning is so deep and thoughtful. It is believed that through continuous reading and practising these chapters, one can understand the golden words of Lord Krishna.

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परिचय | Introduction in Hindi

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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पांडवों के दुश्मन कौरव थे जो पांडु के भाई धृतराष्ट्र के पुत्र थे। धृतराष्ट्र अपने बेटे दुर्योधन को रोक नहीं पाए जो अपने चचेरे भाई पांडवों की उपलब्धियों को कड़वाहट की नज़र से देखता था। दुर्योधन अपने मामा की सहायता से युधिष्ठिर को पासा के खेल में चुनौती देने की व्यवस्था करता है। युधिष्ठिर सब कुछ जुए के खेल में गवा बैठते हैं। पांडवों को निर्वासन कर दिया जाता है, लेकिन जब वे वापिस आते हैं तो उन्हें कौरवों का युद्ध में सामना करना पड़ता हैं। कृष्ण पांडवों के पक्ष में युद्ध में हिस्सा लेते हैं और अर्जुन के सारथी के रूप में कार्य करते हैं। मशहूर "भगवान का गीत" या भगवत-गीता वास्तव में महाभारत का ही एक भाग है। क्रुशेत्र के युद्धक्षेत्र पर अर्जुन जब अपने रिश्तेदारों को लड़ाई के मैदान में खड़ा देखते हैं तो उनका मन मोहित हो जाता है और वे बहुत उदास हो जाते हैं और लड़ने के लिए मना कर देते हैं। उस समय भगवान (श्री कृष्ण) ने स्वयं अर्जुन को जीवन के रहस्य को समझाया और उसे बुराई के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। गावलगाना के पुत्र, संजय, धृतराष्ट्र के सलाहकार और उनके सारथी भी थे। संजय को वेद व्यास ने दिव्य दृष्टि दी थी और इस तरह वह जानता थे कि युद्ध में क्या चल रहा था भले ही वह हमेशा हस्तिनापुर में धृतराष्ट्र के साथ ही थे।

गीता एक आदर्श सामाजिक जीवन जीने का व्यावहारिक दर्शन है। इस दुनिया में कोई भी गीता की महिमा का सम्पूर्ण रूप से वर्णन नहीं कर सकता है। इस पुस्तक को पढ़ कर आप समझ पाएंगे कि परमेश्वर कभी भी हमसे दूर नहीं हैं। परमेश्वर सदा हमारी प्रतीक्षा में रहते हैं की हम कब जीवन की सच्चाई को समझेंगे। इस पुस्तक में उनकी शिक्षाओं का एक संक्षिप्त विवरण दिया गया है, जिन्हे अठारह अध्यायों में बांटा गया है। भगवन श्री कृष्ण के शिक्षाओं और विचारों को बहुत सरल भाषा में समझाया गया है हालांकि उनका अर्थ बहुत ही गहरा और विचारशील है। ऐसा माना जाता है कि इन पाठों के निरंतर पढ़ने से और एक अच्छे भाव से इन पर अमल करने से भगवान कृष्ण के सन्देश को समझा जा सकता है।

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Chapter 1 in English

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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Dhritrashtra said: Sanjaya, gathered on the holy land of Kurukshetra, eager to fight, what did my sons and the sons of Pandu do?

Sanjaya said: At that time, seeing the army of the Pandavas drawn up for battle and approaching Dronacharya, King Duryodhana spoke the following words, “This army of ours fully protected by Bhishma is unconquerable while that army of theirs guarded in every-way by Bhima is easy to conquer”. The grand old man of the Kaurava race, their glorious grand - patriarch Bhishma cheering up Duryodhana roared terribly like a lion and blew his conch. Seated in a glorious chariot drawn by white horses, Krishna as well as Arjuna also blew their celestial conches. Conches, kettledrums, tabors, drums and trumpets blared forth all at once and the noise was tumultuous. Now seeing your sons arrayed against him and when missiles were ready to be hurled, Arjuna, who had the figure of Hanuman on the fag of his chariot took up his bow and then addressed the following words to Krishna:

Arjun said: Krishna, place my chariot between the two armies and keep it there till I have carefully observed the warriors drawn up for battle and have seen with whom I have to engage in this fight.

Sanjaya said: O king , thus addressed by Arjuna, Krishna placed the magnificent chariot between the two armies in front of Bhishma, Drona and all the kings and said, “ Arjuna, behold these Kauravas assembled here”. Now Arjuna saw stationed there, in both the armies, his uncles, grand-uncles, teachers, great grand-uncles, maternal uncles, brothers, cousins, sons, nephews, grand-nephews, friends, fathers-in-law and well-wishers as well. Seeing all the relatives present there, Arjuna was overcome with deep compassion and spoke thus in sorrow.

Arjuna said: Krishna, as I see these kinsmen arrayed for battle, my limbs give way, my mouth is getting parched, a shiver runs through my body and hair stands on end. The bow slips from my hand, my skin burns all over, my mind is whirling and I can no longer hold myself steady. Keshava, I don't see any good in killing my own kinsmen in battle. I do not want to kill them even for the sovereignty over the three worlds, how much lesser is the kingdom here on earth! Krishna, how can we hope to be happy slaying the sons of Dhritrashtra, sin will surely accrue to us. Even though these people with their mind blinded by greed perceive no evil in treasoning and destroying their own race, why should not we, O Krishna. Age-long family traditions disappear with the destruction of a family, virtue having been lost and vice will take the hold of the entire race. Krishna, we hear that men who have lost their family traditions, dwell in hell for an indefinite period of time. It would be better for me if the sons of Dhritrashtra kill me in the battle while I am unarmed and unresistant.

Sanjaya said: Arjuna, whose mind was agitated by grief on the battlefield having spoken thus and having cast aside his bow and arrows sank into the hinder part of his chariot.

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पहला अध्याय | Chapter 1 in Hindi

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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धृतराष्टृ ने कहा: संजय, कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि पर इकट्ठा, लड़ने के लिए उत्सुक, मेरे बेटों और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?

संजय ने कहा: उस समय पांडवों की सेना को देखते हुए, द्रोणाचार्य के पास पहुंचे राजा दुर्योधन ने कहा, "हमारी सेना पूरी तरह से भीष्म द्वारा संरक्षित अजेय है, जबकि उनकी सेना भीम द्वारा संरक्षित जीतने में आसान है।" भीष्म ने दुर्योधन को उत्साहित करते हुए शेर की तरह दहाड़ते हुए अपना शंख बजाया। सफेद घोड़ों द्वारा खींचे गए एक शानदार रथ में बैठे कृष्णा के साथ-साथ अर्जुन ने भी अपने दिव्य शंखो को बजाया। आपके पुत्रों को अपने सामने युद्ध के मैदान में खड़ा देख, जब तीर चलने को तैयार थे, तब अर्जुन जिन्होंने अपने रथ के झंडे पर हनुमान की आकृति ली थी, ने अपना धनुष उठाया और कृष्ण से कहा::

अर्जुन ने कहा: कृष्ण, मेरे रथ को दो सेनाओं के बीच ले चलें और तब तक वहां रखें जब तक मैं युद्ध के लिए तैयार योद्धाओं को ध्यान से देख नहीं लेता जिनसे मैंने युद्ध करना है।

संजय ने कहा: हे राजन, इस तरह अर्जुन द्वारा संबोधित कृष्ण दोनों सेनाओं के बीच शानदार रथ को ले गए और कहा, "अर्जुन, इन कौरवों को यहां इकट्ठा हुए देख।" अब अर्जुन ने दोनों सेनाओं में अपने चाचा, बड़े चाचा, शिक्षक, भाई, चचेरे भाई, बेटे, भतीजे, दोस्तों, दामाद और शुभचिंतको को देखा। वहां मौजूद सभी संबंधों को देखते हुए अर्जुन गहरी करुणा से उबरते हुए कहते हैं:

अर्जुन ने कहा: कृष्ण, जैसे हि मैं युद्ध के लिए तैयार इन रिश्तेदारों को देखता हूं, मेरे अंग सुन हो रहे हैं, मेरा मुंह सूख रहा है और एक कंपकंपी मेरे शरीर के माध्यम से चल रही है। मेरे हाथ से धनुष फिसलता जा रहा है, मेरी त्वचा पूरी तरह जल रही है, मेरा दिमाग घूम रहा है और मैं अब खुद को स्थिर नहीं रख पा रहा हूँ। केशव, मैं युद्ध में अपने स्वयं के रिश्तेदारों को मारने में कोई अच्छा काम नहीं देखता हूँ। मैं इनको मारना नहीं चाहता, यहां तक ​​कि तीनों दुनिया में संप्रभुता के लिए भी नहीं, पृथ्वी पर राज्य के लिए तो कितना कम है! कृष्ण, हम धृतराष्टृ के पुत्रों को मारने से कैसे खुश रह सकते हैं, पाप निश्चित रूप से हमें ही होगा। भले ही इन लोगों के मन में लालच से अँधेरा हो गया हो, अपने स्वयं की जाति को नष्ट करने में कोई बुराई न दिखती हो और मित्रों से राजद्रोह में कोई पाप न दिखता हो, हे कृष्ण, इसके बारे में हमें क्यों नहीं सोचना चाहिए। पारिवारिक परंपराओं, जाति और गुणों का नाश हो जायेगा। हम सुनते हैं कि जो लोग अपनी पारिवारिक परंपराओं को खो देते है, वे अनिश्चित काल के लिए नरक में रहते हैं। इसलिए मेरे लिए बेहतर होगा यदि धृतराष्ट्र के पुत्र, हथियार से सशस्त्र, युद्ध में मुझे मार दें जबकि मैं निहत्था ही रहूं।

संजय ने कहा: अर्जुन, जिसका दिमाग युद्ध के मैदान पर दुख से उत्तेजित था, इस प्रकार बोलने लगा और अपने धनुष और तीरों को अपने से अलग कर दिया और अपने रथ के बाधा भाग में डूब गया।

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Chapter 2 in English

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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Lord Krishna said: Arjuna, how has this infatuation overtaken you at this odd hour? It is shunned by noble souls, neither will it bring heaven nor fame to you. Arjuna, you grieve over those who should not be grieved for and yet speak like the learned. Wise men do not sorrow over the dead or the living. The wise man to whom pain and pleasure are alike and who is not tormented by these contacts becomes eligible for immortality.

The soul is never born nor it ever dies. For, it is unborn, eternal, everlasting and primeval. Even though the body is slain, the soul is not. Weapons cannot cut it, fire cannot burn it, water cannot wet it nor wind can dry it. This soul is unmanifest, incomprehensible and it is spoken of as immutable. Therefore, knowing it as such, you should not grieve.

Arjuna, considering your own duty too, you should not waver for there is nothing more welcome for a man of the warrior class than a righteous war. Now, if you refuse to fight this righteous war and shirking your duty and losing your reputation, you will incur sin.

And the warrior-chiefs who thought highly of you will then despise you thinking that it was fear which drove you away from battle. Die and you will win heaven, conquer and you enjoy sovereignty of the earth. Therefore, stand up Arjuna, get determined to fight.

Arjuna, this attitude of mind has been presented to you from the point of view of Gyanyoga. Now hear the same as presented from the standpoint of Karmayoga. In this path of Karamyoga (of selfless action), there is no loss of effort nor there is fear of contrary result. Even a little practice of this discipline saves one from the terrible fear of birth and death. Those who are full of worldly desires and who look upon heaven as the supreme goal are unwise. Those who are deeply attached to pleasures and worldly power cannot attain the determinate intellect concentrated on God. Your right is to work only and never to the fruit thereof. Do not consider yourself to be the cause of the fruit of action nor let your attachment be to inaction. Arjuna, perform your duties established in yoga renouncing attachment and be even-minded in success and failure. Evenness of mind is called Yoga. Wise men possessing equipoise mind, renouncing the fruit of actions and freed from the shackles of birth attain the blissful supreme state. When your intellect get confused by hearing conflicting statements, then it will rest steady and undistracted (in meditation) on God. You will then attain yoga (everlasting union with God).

Arjuna said: Krishna, what are the characteristics of a God-realised soul? How does the man of stable mind speak, how does he sit, how does he walk?

Lord Krishna said: The sage whose thirst for pleasures has altogether disappeared and who is free from passion, fear and anger; that person is said to have the stability of mind.

He who on meeting with good and evil neither rejoices nor recoils has stable mind. He devotes himself, heart and soul to me. The man dwelling on sense - objects develops an attachment for them; from attachment springs up desire; from desires ensues anger; from anger arises delusion; from delusion, confusion of memory; from confusion of memory, loss of reason and from loss of reason one goes to complete ruin.

But the self-controlled Sadhaka while enjoying the various sense-objects through his senses which are disciplined and free from likes and dislikes attains placidity of mind and true happiness. With the attainment of such placidity of mind, all his sorrows come to an end and the intellect of such a person of tranquil mind withdrawing itself from all sides becomes firmly established in God. He who has not controlled his mind and senses can have no determinate intellect nor contemplation. Without contemplation, he can have no peace and how can there be happiness for one lacking peace of mind.

As the water of different rivers enter the ocean which though full on all sides remains undisturbed ; likewise, he in whom all enjoyments merge themselves without causing disturbance attains peace; not he who hankers after such enjoyments. God realized souls who move free from attachment, egoism and thrust for enjoyment get themselves established in this state even at the last moment attains brahmic bliss.

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दूसरा अध्याय | Chapter 2 in Hindi

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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श्री भगवान ने कहा: अर्जुन, इस महत्वपूर्ण समय में आसक्ति ने आपको क्यों घेर लिया है? इस आसक्ति से न तो आपको सवर्ग मिल पायेगा और न ही आपकी प्रसिद्धि होगी। अर्जुन, आप उन लोगों के लिए शोक कर रहे हैं जिनके लिए दुखी नहीं होना चाहिए और फिर भी इनके समक्ष आप धर्म-अधर्म की बात कर रहे है। बुद्धिमान पुरुष मृत या जीवित पर दुख नहीं करते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति जिसके लिए दर्द और खुशी समान होती है और इन संपर्कों से पीड़ित नहीं होता, वह व्यक्ति अमरत्व के लिए योग्य हो जाता है।

आत्मा कभी पैदा नहीं होती और न ही यह कभी मरती है क्योंकि यह शाश्वत, अनन्त और प्राचीन है। भले ही शरीर मर जाये पर आत्मा नहीं मरती। हथियार इसे काट नहीं सकते, आग इसे जला नहीं सकती, पानी इसे गीला नहीं कर सकता और हवा इसे सुखा नहीं सकती। यह आत्मा अप्रचलित और अपरिवर्तनीय है। इसलिए, इसे इस तरह से जानके आपको शोक नहीं करना चाहिए। अर्जुन, अपने कर्तव्य पर भी विचार करते हुए आपको डरना नहीं चाहिए क्योंकि एक धार्मिक युद्ध से ज्यादा योद्धा वर्ग के एक आदमी के लिए और अधिक स्वागत की बात नहीं है। अब यदि आप इस धर्म युद्ध को लड़ने से इनकार करते हैं तो अपने कर्तव्य को झुकाकर और अपनी प्रतिष्ठा खोने से आप पाप ही करेंगे। और योद्धा-प्रमुख जो आपके बारे में बहुत उचित सोचते थे, यह सोचकर आपको तुच्छ मानेंगे कि वह डर ही था जो आपको युद्ध से दूर ले गया। मर जाओ और आप स्वर्ग जीतेंगे, जीतो और आप पृथ्वी की संप्रभुता का आनंद लें। इसलिए, अर्जुन, खड़े होकर लढने के लिए तैयार हो जायो।

ये सब आपने ज्ञानयोग के दृष्टिकोण से सुना। अब आप इसको कर्मयोग के दृष्टिकोण से सुने। कर्मयोग (निःस्वार्थ क्रिया) के इस रास्ते में प्रयासों का कोई नुकसान नहीं होता और न ही इसके परिणामस्वरूप डर रहता है, यहां तक ​​कि इस अनुशासन का थोड़ा अभ्यास भी जन्म और मृत्यु के भयानक भय से बचाता है। जो लोग सांसारिक इच्छाओं से भरे हुए हैं और जो सर्वोच्च लक्ष्य के रूप में स्वर्ग को देखते हैं, वे मूर्ख हैं। जो लोग सुख और सांसारिक शक्ति से गहराई से जुड़े हुए हैं, वे ईश्वर पर केंद्रित दृढ़ बुद्धि प्राप्त नहीं कर सकते हैं।

आपका अधिकार केवल काम करना है, उसके फल पर कभी नहीं है। आप अपने आप को किसी फल का कारण न माने और न ही किसी मोह को निष्क्रियता का कारण बनने दें। अर्जुन, योग में स्थापित अपने कर्तव्यों का पालन करे, मोह का त्याग करे और सफलता-विफलता दोनों को एक समान से ही देखें। मन की समानता को योग कहा जाता है। बुद्धिमान पुरुष अपने मन को केंद्रित करके फलों का त्याग करके जनम के बंधनों से मुक्त होकर आनंदमय सर्वोच्च को प्राप्त करता है। जब आपकी बुद्धि विवादित वाक्य सुनकर भ्रमित हो जाती है, तो वह भगवान पर स्थित होकर ध्यान करती है और फिर आप योग (भगवान के साथ सार्वकालिक संघ) प्राप्त करते हैं।

अर्जुन ने कहा: कृष्ण, भगवान का एहसास कर चुकी आत्मा की क्या विशेषताएं हैं? स्थिर मन का आदमी कैसे बोलता है, वह कैसे बैठता है, वह कैसे चलता है?

श्री भगवान ने कहा: ऋषि जिनके लिए सुख की प्यास पूरी तरह से गायब हो गई है और जो जुनून, भय और क्रोध से मुक्त है, ऐसा पुरुष अच्छे और बुरे से मुलाकात करते हुए न ही आनन्दित होता है और न ही घबरा जाता है, उसका दिमाग स्थिर रहता है। वह खुद को, अपने दिल को और अपनी आत्मा को मुझे समर्पित करता है। भावनाओं और वस्तुओं पर निर्भर रहने वाले व्यक्ति उनके लिए लगाव विक्सित करते हैं; जिनसे इच्छाओं का जनम होता है; इच्छाओं से क्रोध पैदा होता है; क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है; भ्रम से स्मृति का भ्रम; स्मृति के भ्रम से कारण की हानि और कारणों के नुकसान से वह पूरणता नष्ट हो जाता है।

लेकिन आत्म-नियंत्रित साधक जो अपनी इंद्रियों के माध्यम से विभिन्न भावनाओं का आनंद लेते हुए, अनुशासन में, पसंद और नापसंद से मुक्त, मन की सहजता और सच्ची खुशी प्राप्त करते हैं। मन की ऐसी सहजता की प्राप्ति के साथ उसके सभी दुख समाप्त हो जाते हैं और शांतिपूर्ण मन के ऐसे व्यक्ति की बुद्धि जल्द ही सभी तरफ से अपने आप को मुक्त कर लेती है और ईश्वर में दृढ़ता से स्थापित हो जाती है। जिसने अपने दिमाग और इंद्रियों को नियंत्रित नहीं किया है, उसके पास न तो कोई दृढ़ बुद्धि और न ही चिंतन हो सकता है। चिंतन के बिना उसे शांति नहीं मिल सकती है और मन की शांति की कमी में खुशी कैसे मिल सकती है।

जैसे विभिन्न नदियों का पानी समुद्र में प्रवेश करता हैं जो कि सब तरफ से भरा हुआ है फिर भी निर्विवाद रहता है; उसी तरह वह व्यक्ति जो आनंद को बिना महसूस किये अपने अंदर समा लेता है वह शांति प्राप्त करता है; वह नहीं जो इस तरह के आनंद का सदा इंतज़ार ही करते रहते हैं। ईश्वर अनुभवी आत्माएं जो आनंद के लगाव और अहंकार से मुक्त हो जाती हैं, वे इस स्थिति में स्थापित यहां तक ​​कि आखिरी पल में भी ब्रह्म का आनंद प्राप्त करती हैं।

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Chapter 3 in English

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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Arjuna said: Krishna, if you consider knowledge as superior to action, then why do you urge me to this dreadful action. You are puzzling my mind by these seemingly conflicting expressions. Therefore, tell me the one definite discipline by which I may obtain the highest good.

Lord Krishna said: Man does not attain freedom from action without entering upon action nor does he reach perfection merely by ceasing to act. Surely, none can ever remain inactive even for a moment. Everyone is helplessly driven to action by modes of Prakriti (nature born qualities). He who outwardly restraining the organs of senses and action sits mentally dwelling on the objects of senses, that man of deluded intellect is called a hypocrite. Therefore, do perform your allotted duty as action is superior to inaction. Desisting from action, you cannot even maintain your body.

Having created mankind at the beginning of creation, the creator Brahma said, “Foster the gods through sacrifice, and let the gods foster you”. The virtuous who partake of what is left over after sacrifice are absolved of all sins. Those sinful ones who cook for the sake of nourishing their bodies alone, partake of sin only. Arjuna, he who does not follow the wheel of creation i.e. does not perform his duties and leads a sinful and sensual life, he lives in vain. Therefore, go on efficiently doing your duty at all times without attachment. By doing work without attachment, man attains the supreme.

Whatever a great man does, that very thing other men also do. Whatever standard he sets up, the generality of men follow the same. A wise man established in the self should not unsettle the mind of the ignorant attached to action but should get them to perform all their duties duly performing his own duties. In fact all actions are being performed by the modes of Prakriti (Primordial Nature). The fool whose mind is deluded by egoism thinks, “I am the doer”. The man of perfect knowledge should not unsettle the mind of those ignorant of imperfect knowledge. Attraction and repulsion are rooted in all sense-objects. Man should never allow himself to be swayed by them because they are the two principal enemies standing in the way of his redemption.

Arjuna said: Krishna, now impelled by what does this man commit sin even involuntarily as though driven by force?

Lord Krishna said: As fire is covered by smoke, mirror by dust and embryo by the amnion, so is knowledge covered by desire. The senses, the mind and the intellect are declared to be its seat; covering the knowledge through these, it (desire) deludes the embodied soul. The senses are said to be greater than the body but greater than the senses is the mind. Greater than the mind is the intellect and what is greater than the intellect is he, the self. Thus Arjuna, knowing the self which is higher than the intellect and subduing the mind by reason, kill this enemy in the form of desire that is hard to overcome.

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तीसरा अध्याय | Chapter 3 in Hindi

Shivam Dhuria

Bhagvad Gita

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अर्जुन ने कहा: कृष्ण, यदि आप ज्ञान को क्रिया से बेहतर मानते हैं, तो फिर आप मुझे इस भयानक कार्रवाई के लिए क्यों आग्रह कर रहे हैं। आप मिले-हुए वचनों से मेरे दिमाग को मोहित कर रहे हैं; इसलिए, मुझे एक निश्चित अनुशासन बताएं जिसके द्वारा मैं उच्चतम को प्राप्त कर सकता हूं।

श्री भगवान ने कहा: मनुष्य करम में प्रवेश किए बिना करम से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकता न ही वह कार्य का त्याग कर पूर्णता तक पहुंच पाता है। निश्चित रूप से कोई भी व्यक्ति क्षण के लिए भी निष्क्रिय नहीं रह सकता। हर कोई असहाय रूप से प्रकृति के तरीकों से कार्रवाई करने के लिए प्रेरित है। वह जो बाहरी रूप से भावनाओं और कार्यों के अंगों को रोकता है और मानसिक रूप से इंद्रियों की वस्तुओं पर निवास करता है, ऐसी बुद्धि के व्यक्ति को पाखंडी कहा जाता है। इसलिए अपने करम और कर्तव्य का पालन करें; करम करना निष्क्रियता से बेहतर है। करम किये बिना आप अपने शरीर को भी ठीक नहीं रख सकते।

सृष्टि की शुरुआत में मानव जाति बनाने के बाद निर्माता ब्रह्मा ने कहा, "बलिदान के माध्यम से देवताओं को खुश करने से वे आपको खुश रखेंगे।" बलिदान के बाद जो कुछ बचता है, उसका भाग लेने वाले व्यक्ति सभी पापों से वंचित हैं। वे पापी लोग जो अकेले अपने शरीर को पोषित करने के लिए ही पकाते हैं, केवल पाप का हिस्सा लेते हैं। अर्जुन, जो व्यक्ति सृष्टि के पहिये का पालन नहीं करता और अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता, वह एक पापी और कामुक जीवन की ओर जाता है और व्यर्थ में जीता है। इसलिए मोह को त्याग कर हर समय अपने कर्तव्य को कुशलता से करें। मोह के बिना काम करने से मनुष्य सर्वोच्च प्राप्त करता है।

जो कुछ भी एक महान आदमी करता है, वह अन्य पुरुष भी करते हैं। जो भी उदाहरण वह स्थापित करता है, पुरुषों की सामान्यता उसी का पालन करती है। स्वयं में स्थापित एक बुद्धिमान व्यक्ति को अनजान करम करने वाले व्यक्ति के दिमाग को परेशान नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने में प्रेरित कर अपना कार्य करना चाहिए। वास्तव में सभी कार्यों को प्रकृति के तरीकों से किया जा रहा है। मूर्ख, जिसका दिमाग अहंकार से भ्रमित है, सोचता है, "मैं ही कर्ता हूं।" पूर्ण ज्ञान के व्यक्ति को अपूर्ण ज्ञान के उन अज्ञानी लोगों के दिमाग को परेशान नहीं करना चाहिए। राग और द्वेष सभी अर्थ-वस्तुओं में छिप्पे हुए स्थित हैं। मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्यूंकि वे दोनों ही आपके कल्याणमार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु हैं।

अर्जुन ने कहा: वे क्या चीज़ है जो इस आदमी को पाप करने में प्रेरित करती है, ऐसा लगता है की बलपूर्वक प्रेरित कर रही हो?

श्री भगवान ने कहा: जैसे आग धुएं से ढकी रहती है और धूल से दर्पण, वैसेही ज्ञान इच्छा से ढका हुआ है। इंद्रियां, दिमाग और बुद्धि इसकी जगह ले लेती हैं। इनके माध्यम से ये ज्ञान को ढक लेती हैं। इंद्रियों को शरीर से बड़ा माना जाता है लेकिन इंद्रियों से अधिक मन है। मन से बड़ी बुद्धि है और बुद्धि से बड़ा क्या है वह स्वयं, स्वयं है। इस प्रकार स्वयं को जानो जो बुद्धि से अधिक है और इस दुश्मन को इच्छा के रूप में मार डालो जिसे पराजित करना मुश्किल है।